कान की समस्या क्या हो सकती है?HealthPlanet

Posted on Fri 2nd Dec 2022 : 11:08

कान की समस्या
क्या है ओटाइटिस मीडिया? ओटाइटिस ओट व आइटिस से मिलकर बना शब्द है। ओट का अर्थ है कान, आइटिस यानी सूजन, व मीडिया यानी मध्य। अर्थात कान के मध्य भाग में सूजन आना। हमारा कान तीन भागों से मिलकर बना होता है। पहला बाह्य भाग, जिसमें पिन्ना व केनाल आते हैं। दूसरा मध्य भाग जिसमें कान के पर्दे के पीछे स्थित तीन सूक्ष्म हड्डियां-मेलियस, इंकस, स्टेपिस के अलावा यूस्टेशियन ट्यूब तथा मेस्टोइड एयर सेल्स शामिल हैं। तीसरा आंतरिक भाग लेबिरिन्थ होता है, जिसमें कॉक्लिया, संतुलन बनाने वाली तीन घुमावदार केनाल व अन्य सूक्ष्म संरचना होती है। ओटाइटिस मीडिया में कान का पर्दा, हड्डियां व मेस्टोइड सेल्स प्रभावित होती हैं। इसके मुख्यतः दो प्रकार होते हैं। पहला, एक्यूट जिसमें अचानक से संक्रमण होता है। यहां अचानक से अर्थ दो हफ्ते तक है। डब्ल्यूएचओ के मुताबिक इसमें ज्यादा समय होने पर अवस्था क्रॉनिक कहलाती है। वैसे कई विशेषज्ञ 6 हफ्ते से ज्यादा पुरानी समस्या को ही क्रॉनिक मानते हैं। यह बहरेपन का सबसे प्रमुख कारण है, जो ठीक हो सकता है। इन दोनों अवस्थाओं के जहां लक्षण अलग-अलग हैं, वही इलाज के तरीके भी। एक अनुमान के मुताबिक 10 में से 6 लोगों को 6 साल की उम्र तक में ही एक या ज्यादा बार एक्युट ओटाइटिस मीडिया हो चुका होता है। 15 फीसदी लोगों में क्रॉनिक समस्या मिलती है।
कारण - नाक व गले का संक्रमण कान में पहुंच सकता है। यह ज्यादातर वायरस या बैक्टेरियाजनित होता है। जुकाम रहने पर नाक से कान तक जाने वाली यूस्टेशियन ट्यूब कार्य करना बंद कर देती है, जिससे पर्दे के पीछे दबाव असामान्य हो जाता है। वहां सूजन आने लगती है। इसके फलस्वरूप कई बार पर्दे में छेद हो जाता है। जो कुछ में स्थायी रह जाता हैं। टॉन्सिल्स, बड़े हुए एिडनॉइड्स, एलर्जिक राइनाइटिस व साइनस की समस्या भी इसका कारण बनती है। भीड़भाड़ वाली व गंदगी में रहने वाले कुपोषित लोगों में यह समस्या ज्यादा होती है। कुछेक बार कान में चोट लगने पर बाह्य संक्रमण भी यहां पहुंच सकता है। कुछ लोगों में पर्दे में छेद न होकर, इसके पीछे द्रव्य इकट्‌ठा रह जाता है, जिसे सिक्रेटरी ओटाइटिस मिडिया या ग्लू ईयर कहते हैं।

लक्षण - एक्यूट अवस्था में कान में अचानक दर्द व भारीपन होता है। बुखार, चिड़चिड़ाहट, बेचैनी रह सकती है। कई बार कान बहना आरंभ हो जाता है, जिसके बाद दर्द में आराम मिलता है। क्रॉनिक अवस्था में प्रायः दर्द नहीं होता है। इसमें कान बार-बार कुछ समय के लिए या लगातार बहता है, सुनाई कम देने लगता है। कई लोगों में समस्या केवल पर्दे व सुनने तक ही सीमित रहती है, लेकिन कुछ में यह आस-पास की संरचनाओं को प्रभावित कर सकती हैं। हड्‌डी गलाने वाली स्थिति कोलेस्टिएटोमा से कान में से बदबू आने लगती हैं। इलाज न लेने पर संक्रमण दिमाग में पहुंचकर ब्रेन एब्सेस, पीछे मेस्टोइडाइटिस व लेटरल साइनस थ्रोम्बोसिस, अंदर बढ़ने पर लेब्रिन्थाइटिस व मेनिन्जाइटिस जैसी जटिल बीमारी पैदा कर सकता है। फेशियल नर्व प्रभावित होने पर चेहरा टेढ़ा हो सकता है। घुमावदार केनाल प्रभावित होने पर चक्कर आ सकते हैं। सीक्रेटरी अवस्था में कान नहीं बहता है। सुनाई देना कम होने के साथ कान बंद रहता है।
इलाज - एक्यूट अवस्था को दवाओं से ठीक किया जाता है। बार-बार यह स्थिति होने का कारण यदि टॉन्सिल, एडिनॉइड्स व साइनस समस्या है तो इनका भी इलाज किया जाता है। सीक्रेटरी अवस्था में कई बार माइरिन्गोटॉमी की जाती है, जिससे पर्दे से द्रव्य बाहर निकाला जाता हैं तथा वेंटिलेशन ट्यूब डाले जाते हैं।
सर्जरी की जरूरत - क्रॉनिक अवस्था में ज्यादातर सर्जरी की जरूरत होती है। दवा से संक्रमण काबू में किया जाता है पर्दे के छेद को ठीक करने के लिए प्रत्यारोपण सर्जरी को टिम्पेनोप्लास्टी कहते हैं। यह अन्डरले या इन्टरले तकनीक से हो सकती है। मेस्टोइड हड्डी में गलने पर इसे दुरस्त करना जरूरी होता हैं ताकि संभावित खतरों से बचा जा सके। इसे मेस्टोइडेक्टोमी कहते है। यह दो प्रकार से होती हैं केनाल वॉल डाउन, जिसमें रोग दूर होने पर कान के अंदर केविटी बन जाती हैं व केनाल चौड़ी की जाती हैं। दूसरा इंटेक्ट केनाल वॉल, जिसमें कान का आकार व बनावट कायम रखा जाता है।

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